उज्जैन के पटनी बाजार में तोतला भवन की पहली मंजिल का मकान और गोदरेज की अलमारी के ऊपर रखा ट्रांजिस्टर... हर बुधवार की सुबह से ही ट्रांजिस्टर का गोल बटन घुमाकर रेडियो सीलोन की सुई सेट करने में लग जाते हैं,क्योंकि बमुश्किल सिंगनल पकड़ में आते थे, कई बार तो सुई इतनी बढ़िया सेट हो जाती और साफ सुथरा प्रसारण सुनाई पड़ता मगर कई बार खराब मौसम में खटखड़ाहट के साथ बिनाका गीतमाला सुनना पड़ती..उस वक्त रेडियो सीलोन सेट करना भी घर में कॉलर ऊंची करने वाला काम माना जाता था.. बहरहाल इस सेटिंग का एक ही मकसद रहता था कि रात को 8 बजे आने वाली बिनाका गीतमाला बिना किसी बाधा के सुनी जा सकें...अमीन सायानी की जादुई आवाज के साथ पसंदीदा गीतों को उनकी पायदानों के साथ सुनने का क्या गजब आनन्द था...जो आज तमाम सुख सुविधाओं के बावजूद उतना रसीला नहीं लगता...अमीन सायानी के निधन के चलते बिनाका गीतमाला का वह सुनहरा दौर सभी को याद आ गया ..तब घर-घर में बड़े रेडियो या ट्रांजिस्टर हुआ करते थे , जिस पर क्रिकेट की कमेंट्री के साथ विविध भारती और रेडियो सीलोन पर बिनाका गीतमाला बड़े चाव से पूरा परिवार एकजुट सुनता था .. स्थिति ये रहती थीं कि बुधवार को रात 8 से 9 के बीच एक तरह का अघोषित कर्फ्यू सन्नाटा पसरा रहता ..गली मोहल्ले से लेकर मुख्य चौराहों की पान की दुकानों पर भी तेज आवाज में बिनाका गीतमाला बजती थी और झुंड बनाकर लोग उसका आनंद उठाते ...इसी तरह का मजमा फिल्म शोले के वक्त भी नज़र आया..जब उसके डायलॉग पान की दुकानों पर इसी तरह गूंजते थे... अमीन सायानी के साथ ही बचपन की वो एक आवाज भी खामोश हो गई... जिसको सुनते हुए हम सब बढ़े हुए.. हालांकि आज कारवां सहित तमाम माध्यमों के जरिए अमीन सायानी की आवाज कानों में गूंजती रहती है और हमें अतीत के गलियारों में उंगली पड़कर ले भी जाती है ...क्या शानदार दौर था और क्या शानदार लोग थे...आज की पीढ़ी ऐसे आनंद और नॉस्टैल्जिक इफेक्ट से अछूती ही रहेगी... अलविदा अमीन भाई... आप सदैव उस दौर की बहनों और हम भाईयों के दिलों में रहोंगे... आमीन
@ *राजेश ज्वेल*

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