Saturday, 22 September 2018

"वो खेत-खलिहान और वो बचपन..." - रामचन्द्र शुक्ल



स्कूल जाने के लिए घर के पिछवाड़े के खेत की मेड़ से जाना होता। बना में सबसे पहले बरगद का विशाल पेड़ पड़ता, जिसके नीचे गर्मी के दिन बीतते। बरगद के चबूतरे पर शीष नवाकर बच्चों की टोली खेतों के मेड़ों से होती हुई रामाधीन के बना पहुँचती। फिर स्कूल आ जाता। बप्पा पिछवाड़े के खेत में भदैली ककड़ी बोते। उसकी रखवाली के लिए मचान बनता। मचान पर चढ़कर सोने के लिए होड़ लगती। भादों में रात में ककड़ियाँ पककर फूटतीं, तो उनकी खुशबू पूरे खेत में फैली रहती। सबेरे ककड़ी के बजाय खुशबूदार पके पेहटुल्ले की खोज होती, जो ज्यादा मीठे होते। जब तक ककड़ियाँ कच्ची रहतीं, कच्ची खाई जातीं। पककर फूटने पर 4-5 किलो तक की ककडियां घर आतीं, तो घर के सभी लोग खाते।
उन दिनों पानी भी खूब बरसता था। बारिश में पके मूंग व उद उखाकर घर आते, तो उनकी फलियाँ घर में तोड़ी जातीं। कुडिया नाम का काले रंग का धान सबसे पहले पकता, जिसे काका खेत से काटकर लाते, तो बारिश के कारण उसे घर के भीतर ही पीटकर धान इकट्ठा किया जाता। सूखने पर अम्मा उसे मूसल से कूटकर उसका चावल निकालतीं। इस चावल की खिचड़ी बहुत स्वादिष्ट बनती। यही खिचड़ी खाकर हम सब स्कूल जाते।
भादों पूर्णिमा से मेलों का मौसम शुरू हो जाता। दीवाली पर नए धान का घर की ओखली में कुटा चूरा खूब चबाया जाता। इसके साथ चीनी के बने खिलौने भी चबाए जाते। कातिक में खेत तैयार हो जाते, तो घर के सभी लोग मिलकर आलू बोते। जिस दिन खेत का काम रहता उस दिन स्कूल जाने से छुट्टी। आलू पूरी तरह पके बिना ही खोदकर घर आने लगता। अम्मा नई आलू की तरकारी बनातीं। हम सब उन्हे तपता(अलाव) में भूनकर खाते। इसी बीच गंजी(शकरकंद)भी तैयार हो जाते। सफेद दूधिया शकरकंद कच्चे भी खाए जाते और भूनकर भी। भूख लगने पर बच्चे स्कूल आते-जाते शकरकंद खेतों से निकालकर खाते। पकने व बढने पर शकरकंद खेतों में बाहर दिखने लगते।
दिसम्बर-जनवरी में मटर में फलियाँ आने लगतीं। मटर के पे का ऊपरी सिरा बेहद मुलायम व मीठा होता। भूख लगने पर बच्चे उसे भी तोडकर खाते। रास्ते में पने वाले चने के खेतों से साग तोडकर खाया जाता। मटर की कच्ची छीमियाँ तोडकर जेबों में भर ली जातीं और रास्ते में उन्हे खाते हुए स्कूल आते-जाते। जिस दिन आलू व गंजी की खुदाई होती, उस दिन स्कूल की छुट्टी। बड़े लोग इनकी खुदाई करते बच्चे उन्हे बीनकर इकट्ठा करते। खेती का जब भी काम होता उस दिन स्कूल की छुट्टी करनी पड़ती। यह सिलसिला 1970-71 से शुरू होकर 1980-81 तक चलता रहा।
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लेखक की फेसबुक प्रोफाइल- 

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Tuesday, 4 September 2018

"भारत: एक उत्सवप्रधान देश"- राजेश यादव


बचपन में पढ़ा था कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। अब इस उम्र में आकर प्रतीत होता है, भारत कृषि के साथ साथ पर्व प्रधान देश भी है।
आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। कल से घर के बच्चे जन्माष्टमी की झाँकी की तैयारी में लगे थे। कुछ पैसा हमसे लिया,कुछ अपनी दादी,चाची,चाचा ,मम्मी से लिया बाकी आपस मे कंट्रीब्यूट कर झाँकी का खर्च जुटा ही लिया।
अभी तैयारी चल रही है। आजकल सबकुछ रेडीमेड मिलता है। मुझे लगता है, घण्टे भर से कम समय मे इनकी झाँकी सज जाएगी।
सब खुश हैं, पनीर,खीर का भोग आपकी भतीजियों ने खुद तैयार किया है। मेरे आग्रह पर घर की मुखिया माताजी ने मूँगफली के दाने,गरी शक्कर में जमाकर कतली तैयार कर दी है।
संयुक्त परिवार में छोटे बड़े मिलाकर 9 सदस्य हैं। सब खुश हैं। सबकी खुशी देख कर हम भी खुश हैं। यही भारत देश की विशेषता है कि खुशी मनाने का कोई अवसर नही छोड़ता।
मुझे भी अपना बचपन याद आ गया,जब हम भी एक महीने पहले से ही हर त्योहार की तैयारी करते थे। टॉफी, कम्पट, चूरन,चोगला, बरफ के लिए मिली चवन्नी को बचा बचा कर खिलौने खरीद लाते थे।
उस समय के मिट्टी वाले खिलौनों में वाकई बस जान की ही कमी होती थी। हाथी ,घोड़ा, सिपाही,बैलों वाला किसान, चाक चलाता कुम्हार,गर्दन की जगह स्प्रिंग लगे बुड्ढा बुढ़िया इन मूर्तियों में बहुत कॉमन हुआ करते थे।
प्लास्टिक के छोटे छोटे खिलौनों का मजबूत कलेक्शन हम कर ही लेते थे। इनमे युद्ध लड़ते फौजी,टैंक, कारें, घुड़सवार मुख्यतः होते थे।
इतना सब इकट्ठा करने के बाद अपन सुबह से अपने दोस्तों के साथ मिशन झाँकी में जुट जाते थे। सबको काम बांट दिया जाता था।
कोई रेलवे पटरी के किनारे गिरे हुए खँजड़ कोयले को बोरी में भर कर ले आता था, क्योंकि पहाड़ तो इसी से बनते थे। पहाड़ की चोटी पर बर्फ जमाने के लिए रुई मोहल्ले के डॉक्टर साहब की क्लिनिक से आती थी। कुछ प्लास्टिक के सैनिक और जानवर पहाड़ पर सजा दिए जाते थे।
आरा मशीन से लकड़ी का बुरादा भी आता था। उसको विभिन्न प्रकार के रंगों में रंग धूप में सुखा लिया जाता था। मसलन, काला बुरादा सड़क के लिए,हरा बुरादा खेल मैदान और खेत के लिए, भूरा बुरादा युद्ध के मैदान और जुते खेत मे प्रयोग होता था। स्कूल की किताबों को आस पास रख छन्नी से छानकर हम सब इस स्ट्रक्चर को तैयार करते थे। आज बच्चा पार्टी इसके लिए थर्माकोल की शीट इस्तेमाल कर रही है।
अब बारी आती थी सूप पर धरे घनश्याम, नदी पार कर रहे वासुदेव और फन का छाता ताने नाग की मिट्टी की मूर्ति की तो, पीतल की परात में पानी भर काम चल जाता था।
इतनी तैयारी देख मोहल्ले के सभी बच्चे अपने अपने खिलौने लेकर रिकुएस्ट करते थे कि, हमारे भी सजा लो न ! लड़कियां अपनी गुड़िया सजाने की सिफारिश घर भीतर अपनी चाची,ताई से करती थीं। हाईकमान के आदेश को मानना मजबूरी था इसलिए बचे बुरादे को मिक्स कर गुड्डे गुड़िया के लिए फील्ड तैयार हो जाती थी।
पिताजी, किराए पर लायी हुई नॉवेल या जन्माष्टमी विशेषांक अखबार को पकड़ अलग निकल लेते थे।
कुल मिलाकर सार ये है कि इस फानी दुनिया मे खुश होने का कोई मौका न चूकिए। होली हो,दिवाली हो, लोहड़ी हो ईद हो या क्रिसमस सबको जम कर मनाइए। इस देश की 135 करोड़ आबादी में अधिकतर हम जैसे मध्यम वर्गीय लोग ही हैं। कुल जनसंख्या के मात्र 5% अमीरों और .05% इंटेलेक्चुअल लोगों को उनके हाल पर छोड़ दीजिये। उनकी खुशी के मायने उन्हें खुद ही पता नही है। हमारी तरफ से सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई!

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"चलो आज ज़रा पढ़ते हैं!"- राजीव कुमार मनोचा



यों ही एक पोस्ट पर कॉमेन्ट डालते कुछ याद आया। और मैं हस्बे आदत बह सा गया माज़ी की तरफ़, अतीत की ओर!
            मुद्दा था ओशो की एक लम्बी सी पोस्ट जिसका क़द्दावर आकार देख एकबारगी मेरे भी होश फ़ाख़्ता हो लिए। तब याद आये वे दिन जब हम टेस्ट मैच वाली पत्रकारिता करते थे। डरिये नहीं, मैं कोई क्रिकेटर या खेल पत्रकार वग़ैरह नहीं था कभी। दरअसल मैगज़ीन में लिखने को टेस्ट मैच, अख़बार लेखन को 50-ओवर और फ़ेसबुक जर्नलिज़्म को 20-20 मैच मानता हूँ मैं। किसी अनुभवी पत्रकार से पूछिए, हाँ में सर हिला देगा वह। ख़ासकर 'लास्ट सन्डे' पत्रिका में मेरे लेख बहुत लम्बे हुआ करते- 5 से लेकर 8 पृष्ठ तक आम तौर पर। एक बार गोरखालैंड पर लिखा आलेख तो 12 पृष्ठों तक जा पहुंचा ! लिखने वाला मजनून था या कौन रब्ब जाणे, पर पढ़ने वाले धन्य थे बेचारे!
            और आज देखिए, लम्बी पोस्टें देख ख़ुद हमें पसीना आने लगता है। एक बार को ठिठक सी जाती है नज़र। आदत भी क्या चीज़ होती है ! जुम्आ जुम्आ साढ़े 3 बरस हुए मुझे 20-20 खेलते और आदत ऐसी बिगड़ गई ! अच्छी तरह याद है, फ़रवरी 2015 में दिल्ली चुनावों पर खेला था अपना पहला ट्वेंटी-ट्वेन्टी। और अब उसी की आदत ने लपेट छोड़ा हमें। कल फिर कहीं टेस्ट खेलना पड़े तो विपदा ही पड़ जाये!!
            यों ही माज़ी में टहलते टहलते ज़हन कुछ और, ज़रा और पीछे चला गया। 30-40 साल पीछे 70-80 के दशक में। वह जब विद्यार्थी हुआ करते थे अपन। तब आज की तरह न केबल था, न इंटरनेट। टीवी भी हर घर में नहीं था। होता भी क्योंकर ? न लोगों के पास ज़्यादा पैसे थे और न टीवी पर अधिक प्रोग्राम ! एक दूसरे से मिलना, संवाद करना, दुख-सुख बांटना, बस यों कहिए कि human interaction ही सबसे बड़ा ज़रिया था दिलबहलाव का।
            हाँ, एक और बड़ा साधन था जी के बहलाने को...किताबें। ज्ञान-ध्यान की नहीं बल्कि नॉवेल और पत्रिकाएं। हर तरह की पत्रिका बिकती थी...साहित्यिक कादम्बिनी, धर्मयुग... हास्य प्रधान चम्पक, लोट-पोट... ज्ञानवर्धक चन्दामामा...सनसनीपूर्ण सत्यकथा, मनोहर कहानियाँ...राजनैतिक भू भारती, माया...नारी प्रधान छाया, मुक्ता, मनोरमा...फ़िल्मी सुषमा, मायापुरी और भी जाने कितनी। और अभी तो मैंने उर्दू-अंग्रेज़ी पत्रिकाओं के नाम नहीं गिनवाए!
            नॉवेल का बाज़ार भी बहुत गर्म था अलबत्ता लिटरेरी नॉवेल- साहित्यिक उपन्यास मेरे दौर तक आते आते उतने लोकप्रिय नहीं रह गए थे। 60 के दशक में कहीं खोना शुरू हो गए थे अपना आधार और बुद्धिजीवियों तक सिमटने लगे थे। गुलशन नन्दा ' नाम की रोमांटिक आंधी ले उड़ी थी पाठकों, विशेषकर महिला वर्ग के पठन्तों को। कैसी दीवानगी थी इस लेखक की, क्या बताऊँ ! फिर किसी पोस्ट में अलग से इन पर लिखूंगा वरना यह पोस्ट गुलशन नन्दामयी हो जाएगी। इसके अलावा साधना प्रतापी, राजहंस और रानू जैसे लेखक भी ख़ूब पढ़े जाते। किराए पर नॉवेल लिए जाते। 1 रुपया किराया था सुपर स्टार गुलशन नन्दा के उपन्यास का और बाकियों के 50 से 75 पैसे प्रतिदिन किराये पर मिल जाते। महिलाएं आपस में नॉवेल एक्सचेंज करतीं और अगले दिन अपना अपना किराया बचा कर वापस भी कर देतीं। ज्ञातव्य हो कि इन महिलाओं की औसत शिक्षा 8वीं से 12वीं तक थी बस और ये घर के सारे काम रसोई-बर्तन-सफ़ाई ख़ुद ही करती थीं। आज के मुझ जैसे पढ़े लिखों को शर्म आनी चाहिए, एक तवील पोस्ट देख कर कंपकंपी छूटने लगती है। औसतन 300 से अधिक पन्नों के नॉवेल हुआ करते जिन्हें एक-दो रोज़ ही में चट कर जातीं वे, फ़िल्मी व अन्य पत्रिकाओं के अलावा। जी, वे सन्नारियां जिन्हें आप कम पढ़ा लिखा बता अपनी शिक्षा पर फूले नहीं समाते।
            पुरुष रोमानी उपन्यास ज़रा कम पढ़ते पर उनके लिए भी पूरा सामान मौजूद था। ओमप्रकाश शर्मा, वेदप्रकाश शर्मा, वेदप्रकाश काम्बोज, विमल चटर्जी, सुरेन्द्र मोहन पाठक एवं कर्नल रंजीत के जासूसी उपन्यास उनकी ख़ुराक मयस्सर करवाते। ख़ूब बिकते और ख़ूब किराए पर लिए जाते इन महानुभावों के नॉवेल। हालांकि पुरुषों की नॉवेल निपटाने की रफ़्तार ज़रा कम थी औरतों-लड़कियों से। दोनों के बीच का पुल या कॉमन फेवरेट कहें तो वे कोई और नहीं गुलशन नन्दा ही थे। वैसे अधिकांश मर्दों की पसंदीदा पत्रिकाएं माया, सत्यकथा और मनोहर कहानियाँ थीं।
            आज हम विज़ुअल वर्ल्ड के ग़ुलाम हो गए। केबल के ड्रामाई सीरियल हमें अपने समाज और विशेषतया नारी का नक़ली, नाटकीय रूप दिखाते हैं, विकिपीडिया से रेडीमेड जानकारी उठाते हैं हम जो अक्सर प्रामाणिक नहीं होती। और लेखकों की सुंदर रोमानी दुनिया को अलविदा कह फ़िल्म स्टार्स व राजनेताओं के नौटंकी संसार को अपना चुके हैं हम!
            अरे हां, बात पठन पाठन से शुरू हुई थी ! तो जनाब, वह अब सीमित है कोर्स की शुष्क, बेमज़ा किताबों तक। और वह भी गहन अवगाहन हेतु नहीं, बस रट-रटा कर परीक्षा में ताबड़तोड़ नम्बर लाने की ग़रज़ से। लेखकों और उनके दीवानों का दौर गुज़रे कल के साथ गुज़र गया, शायद फिर कभी वापस न आने के लिए!!

https://www.facebook.com/rajeev.manocha.9?ref=br_rs

"वो खेत-खलिहान और वो बचपन..." - रामचन्द्र शुक्ल

स्कूल जाने के लिए घर के पिछवाड़े के खेत की मेड़ से जाना होता। बना में सबसे पहले बरगद का विशाल पेड़ पड़ता , जिसके नीचे गर्मी के दिन बीत...