Thursday, 23 September 2021

"दास्तान ए शौक - पढ़ना"- सिंह उत्तम



 


पहली किस्त
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पढ़ना, पढ़ना और बहुत सारा पढ़ना, यही शौक पाला बचपन से जो अब तक ज़िन्दा है. मुझे याद नहीं कि छपे हुए अक्षरों से मुझे कब और कैसे मुहब्बत हो गयी लेकिन जैसे शराबी कहते हैं न कि ‘छूटती नहीं है काफ़िर मुंह की लगी हुई’, ठीक वैसे ही मुझसे ‘छूटती नहीं है काफ़िर दिल से लगी हुई. पहली याद जो आती है मुझे वो कुछ ऐसी है कि मेरी करीब पांच साल की उम्र थी जब पापा का ट्रांसफ़र लखनऊ से ग़ाज़ीपुर हो गया. एक रोज़ पापा कहीं बाहर गये हुए थे और घर में नमक ख़त्म हो गया. मां ने मुझसे कहा कि कम्पाउन्ड के बाहर ही दुकान है, वहां से दस पैसे का नमक ले आओ. मेरे जवान मित्रों, दस पैसे पर हंसियेगा नहीं क्योंकि यह बात है 1964 की और उस समय दस पैसे में ढेर सारी चीज़ें मिल जाती थीं. तो जनाब, मैं कागज़ के लिफ़ाफ़े में नमक ले कर आ रहा था और लिफ़ाफ़े पर छपे अक्षरों को जोड़ जोड़ कर पढ़ने में इतना तल्लीन हो गया कि लिफ़ाफ़ा फट गया और गिरता हुआ नमक संभालना मेरे नन्हें हाथों के लिये मुश्किल हो गया. संयोगवश उसी समय मेरा हमउम्र एक देहाती लड़का वहां से निकल रहा था जो दौड़ कर आया और अपने अंगोछे में उसने नमक सहित लिफ़ाफ़ा लपेट लिया और मुझे घर तक पहुंचाने आया. मुझे बाद में मालूम हुआ कि उसका नाम मनकू था और वह एक अंग्रेज़ लेडी डॉक्टर के ख़ानसामा रफ़ीक का बेटा था. बाद में हम दोनों गहरे दोस्त हो गये और तमाम शरारतें एक साथ करने लगे. शायद मेरे पढ़ने की शुरुआत इसी घटना से हुई थी क्योंकि घर आ कर मैंने उस फटे लिफ़ाफ़े को पढ़ा था. उस पर कुछ कार्टून भी बने थे. इसके बाद मैं जहां-तहां जो कुछ पढ़ने के लिये मिल जाये, पढ़ने लगा और बहुत तेज़ी से हिन्दी पढ़ना सीख गया. मेरी मां ने मेरे लिये घर में उस समय की प्रसिद्ध बाल पत्रिकायें पराग, नन्दन और चन्दामामा लगवा दीं. मेरा हाल यह था कि मैं एक ही दिन में पूरी पत्रिका चाट जाता था और फिर यहां वहां कुछ पढ़ने के लिये खोजता रहता था. जब मैं दूसरी कक्षा में था तो मेरी बड़ी बहन सातवें दर्जे में थी. मैं उनकी सारी किताबें निकाल कर पढ़ डालता था (गणित के सिवा जिससे मुझे आज भी उतनी ही नफ़रत है जितनी करेले से). इतिहास और हिन्दी की किताबें मुझे बड़ी रोचक लगती थीं. इन्हें पढ़ने के बाद मैं भूगोल और नागरिक शास्त्र की किताबें भी पढ़ डालता था. फिर जा कर अंग्रेजी की किताब का नम्बर आता था. शाम को जिस समय स्कूल से आकर सारे बच्चे खेलने निकल जाते थे, मैं कोई किताब ले कर जुट जाता था. मेरी मां मुझसे हमेशा कहती थीं कि तुम हर समय पढ़ा करते हो, शायद कभी भी कोई तुम्हारा दोस्त नहीं होगा (कालान्तर में यह बात ग़लत सिद्ध हो गयी क्योंकि अब मेरे अगणित मित्र हैं). 
 
पढ़ना, पढ़ना और बहुत सारा पढ़ना
दूसरी किस्त
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1968 में पापा का ट्रांसफर आज़मगढ़ हो गया. यहां हमारे कम्पाउन्ड में मेरे हमउम्र बहुत से लड़के लड़कियां थे और उनमें से कुछ पढ़ने के भी शौकीन थे. मेरी जल्दी ही उनसे दोस्ती हो गयी और हम लोग अपने अपने घर में आने वाली पत्रिकाओं का आदान प्रदान कर के पढ़ने लगे. यहां आते आते इन पत्रिकाओं में इन्द्रजाल कॉमिक्स की वेताल (फ़ैन्टम) और मैन्ड्रेक की चित्रकथायें भी थीं. अगले साल मैं छठे दर्जे में वेस्ली इन्टर कॉलेज में भर्ती हो गया जहां पर सौभाग्यवश लाइब्रेरी भी थी. मैंने भी लाइब्रेरी का कार्ड बनवा लिया और जब वहां किताब लेने गया तो लाइब्रेरियन जिनका नाम श्री के.के. वर्मा था, बोले कि तुम्हारे मतलब की किताबें अभी नहीं हैं यहां. उन्हें शायद इस बात का अहसास नहीं था कि मुझे तो छपे हुए अक्षरों से ही मुहब्बत थी. मित्रों, क्या आप यकीन करेंगे कि छठे दर्जे में पढ़ते समय ही मैंने श्री विष्णु प्रभाकर की ‘आवारा मसीहा’ जो श्री शरतचन्द्र की जीवनी है, पढ़ डाली जबकि मैंने इससे पहले शरतचन्द्र का नाम भी नहीं सुना था. इस लाइब्रेरी में श्री रांगेय राघव द्वारा हिन्दी में अनूदित शेक्सपीयर के कई नाटक थे जो मैंने एक सिरे से पढ़ डाले. साथ में जो भी किताब मिल जाये, मैं पढ़ डालता था चाहे वह कृषि सम्बन्धी हो चाहे विज्ञान सम्बन्धी. एक किताब मुझे अच्छी तरह याद है जब मैं गाज़ीपुर में था तो स्कूल की लाइब्रेरियन ने मुझे दी थी जिसमें घर में साबुन और मोमबत्ती बनाने का तरीका दिया हुआ था लेकिन मैंने उसे भी पूरा पढ़ डाला. श्री वर्मा को लगा कि मैं शायद यूं ही किताबें इश्यु करवा कर ले जाता हूं इसलिये उन्होंने एक दिन मेरी परीक्षा लेने की ठान ली. उन्होंने मुझे बैठा कर मेरा लाइब्रेरी कार्ड निकाला और उस समय तक मैं जितनी किताबें वहां से ले चुका था, उन सबके बारे में मुझसे पूछा कि किसमें क्या लिखा है ? मेरा तो यह पसन्दीदा विषय था तो मैं खुशी से उन्हें उत्तर देता गया. उस दिन के बाद वर्मा जी ने मुझे ख़ुद किताबें छांट कर देना शुरु कर दिया. शायद मेरे अन्दर छुपे हुए जिज्ञासु और समर्पित पाठक को सबसे पहले उन्होंने ही पहचाना था. जब मैं आठवीं क्लास में था तब लाइब्रेरियन वर्मा जी मुझसे बाकायदा किताबों के बारे में ऐसे बात किया करते थे जैसे अपने किसी हमउम्र से बात कर रहे हों.
लेकिन समय के साथ साथ मेरी रुचि कथा साहित्य में अधिक बढ़ती गयी और इतनी बढ़ी कि मैंने दूसरी किताबें यथा निबन्ध और कविता आदि पढ़नी बन्द ही कर दीं. इस शौक का असर मेरी पढ़ाई पर बुरा पड़ रहा था. जब भी मैं पढ़ने बैठता, मेरे ध्यान में कहानी की किताबें ही आने लगती थीं. मेरी मां, जो स्वयं भी एक अध्यापिका थीं और बहुत अधिक अनुशासनप्रिय थीं, कहानियों के प्रति मेरी बढ़ती रुचि देख कर चिन्तित रहने लगीं यद्यपि मेरे बचपन में उन्होंने मेरे लिये कई पत्रिकायें लगवा रखी थीं. अब मुझे हर समय कहानियां पढ़ने के लिये डांट पड़ने लगी और अगर परीक्षा में कम अंक मिले तो पिटाई भी होने लगी. लेकिन मेरा जुनून बढ़ता गया. हमारे घर में रात दस बजे सबको सो जाना होता था. जाड़े के मौसम में मैंने रात में कहानियां पढ़ने के लिये एक तरकीब निकाली. अपनी पॉकेटमनी से मैंने टॉर्च का एक सेल और होल्डर सहित उसका बल्ब ख़रीदा. मैं होल्डर के तारों को सेल के दोनों सिरों पर लगा कर बल्ब जला लिया करता था. अपने इस बहुमूल्य ‘यन्त्र’ को मैं रज़ाई में छुपा कर रखता था और रात में रज़ाई मुंह के ऊपर तक ओढ़ कर इसकी रोशनी में किताबें पढ़ता था लेकिन जल्दी ही अपनी नासमझी से पकड़ा गया और मेरा यह यन्त्र मुझसे छीन लिया गया. असल में हुआ यह था कि मैं रज़ाई में अपना यह यन्त्र लिये हुए कोई कहानी पढ़ रहा था और उस कहानी के किसी प्रसंग पर मुझे बेसाख़्ता हंसी आ गयी और बस मेरा राज़ खुल गया. मां ने कहा कि अगर तुमको कहानियां पढ़ने का इतना शौक है तो अपने खेलने के समय में कुछ कमी करो और उतने समय में कहानियां पढ़ लो लेकिन घर में पढ़ाई और सोने के समय में कोई कटौती नहीं की जायेगी. नतीजतन, जब कम्पाउन्ड के सारे लड़के लड़कियां बाहर खेल रहे होते थे तो मैं एक किताब में मुंह घुसाये उसे पढ़ता रहता था. 
 
पढ़ना, पढ़ना और बहुत सारा पढ़ना
(तीसरी किस्त)
एक दिन मेरे पास पढ़ने के लिये कुछ भी नहीं था और मैं बहुत बोर हो रहा था. मैं अपने एक दोस्त के घर कोई किताब मांगने के लिये गया. वहां उसके बड़े भाई ने मुझे इब्ने सफ़ी, बी.ए. का लिखा और ‘जासूसी दुनिया’ से छपा एक उपन्यास थमा दिया. जासूसी उपन्यास और मेरे घर में ??? कहर हो जाता अगर मेरी मां को पता चल जाता. (पापा बड़े लिबरल थे हमारे, थोड़ा डांट फटकार कर चुप हो जाते और बाद में मिठाई-विठाई खिला कर या कुछ पैसे दे कर हमें डांटने का मुआवज़ा चुका देते) ख़ैर तो उस उपन्यास को लेकर उसे अपने कपड़ों में छुपा कर मैं घर आ गया. जहां तक मुझे याद आता है इस उपन्यास का नाम ‘ख़ून की बौछार’ था. इस जासूसी उपन्यास के नायक कर्नल विनोद और उनके सहयोगी कैप्टन हमीद थे. यह उपन्यास मुझे एक नयी दुनिया में ले गया. किसी का क़त्ल होना, लाश का छुपाया जाना, गोलियों का चलना, जासूस का ख़तरों से खेलना और कातिल का पकड़ा जाना, यह सब मेरे लिये एक अबूझ दुनिया थी. अब पराग, चन्दामामा इत्यादि मेरे लिये दूसरे स्थान पर आ चुकी थीं. हां, इन्द्रजाल कॉमिक्स के वेताल (फ़ैन्टम) और मैन्ड्रेक की कहानियां मैं बदस्तूर उसी शौक से पढ़ता रहा. जिस दोस्त के घर से मुझे यह उपन्यास मिला था, उनके यहां इब्ने सफ़ी के उपन्यासों का ज़बरदस्त कलेक्शन था जो अब मैं एक एक कर के पढ़ता जा रहा था. लगातार जासूसी उपन्यास पढ़ पढ़ कर मेरा दिमाग़ भी शक्की होने लगा. हर घटना को मैं अपनी कम उम्र में ही जासूसों की तरह बारीकी से परखने की कोशिश करने लगा. हर घटना का विश्लेषण मैं अपनी कम उम्र में भी कर्नल विनोद की तरह करता था और अक्सर मेरा निकाला नतीजा सही भी होता था. यह दूसरी बात थी कि यह राज़ मेरे पास ही रहता था. अभी तक घर में किसी को पता नहीं था कि मैं जासूसी उपन्यास भी पढ़ने लगा हूं. लेकिन हाय रे भाग्य, एक दिन कोर्स की पुस्तक में छुपा कर उपन्यास पढ़ रहा था और क़ातिल एकदम पकड़ा ही जाने वाला था कि उससे पहले मैं पकड़ा गया. उफ़, एक तो कोर्स की किताब में उपन्यास और वह भी जासूसी. नतीजा वही, जम कर पिटाई, किताब का फाड़ा जाना और लानत मलामत. कुछ दिन तो मैं किताबों से दूर रहा लेकिन क्या करता जब कर्नल विनोद और कैप्टेन हमीद मुझे लगातार आवाज़ देते रहे. इब्ने सफ़ी साहब के स्थायी पात्र, कर्नल विनोद, कैप्टेन हमीद, कासिम, राजेश, जोली, मदन, फ़ाइव टू, डॉक्टर डारकेन, संग ही मेरे दिमाग़ में उथल पुथल मचाये रहते थे. दोस्तों, ये सिलसिला फिर चालू हो गया. जिस रफ़्तार से मैं उपन्यास पढ़ता था बेचारे इब्ने सफ़ी साहब उस रफ़्तार से तो लिख नहीं सकते थे नतीजतन मैं दूसरे लेखकों की ओर भी मुड़ा और वेदप्रकाश काम्बोज, ओमप्रकाश शर्मा और कर्नल रंजीत का भी पाठक हो गया. साथ साथ मैं पत्रिकायें भी पढ़ता रहा क्योंकि मेरी आंखों और दिमाग़ को तो पढ़ने का नशा था. पत्रिकाओं में मेरी कोई चॉयस नहीं थी. जो मिल जाये उसका एक एक अक्षर चाट जाता था. विज्ञापन तक पढ़ लिया करता था. एक अच्छी बात यह रही कि पढ़ाई में मां की सख़्ती के कारण मैं स्कूल की पढ़ाई में ठीक रहा (गणित को छोड़ कर). हाईस्कूल में गणित अनिवार्य थी और मैं सोचता था कि गणित में मैं पक्का फ़ेल हो जाऊंगा इसलिये जीवन भर हाई स्कूल से नहीं निकल सकूंगा लेकिन वह किस्सा फिर कभी कि मैं कैसे गणित के समुन्दर से पार हो गया और वह भी पहली ही बार में.
क्रमशः..............
 
(अगली किस्त अगली पोस्ट में)
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Saturday, 18 September 2021

"नौटंकी" - अशोक पाण्डे

 

रामनगर में हमारे घर के सामने एक बड़ा सा ऊबड़-खाबड़ मैदान हुआ करता था. इसके एक हिस्से में काशीपुर-मुरादाबाद जाने वाली प्राइवेट बसों का अड्डा था. बसों के क्लीनर बसों में झाडू लगाते तो हम छोकरे उस कूड़े को बीना करते थे. हमने माचिस के डिब्बे इकठ्ठा करने की हॉबी पाली हुई थी.

यह मैदान में हर साल जुलाई-अगस्त के महीने में एक रंगबिरंगी नुमाइश का आयोजनस्थल बन जाया करता. नुमाइश का एक जबरदस्त आकर्षण होता था सात दिन- सात रात साइकिल चलाने वाला एक आदमी जो टांडा या स्वार जैसी किसी जगह से आया करता. पतंगबाजी के मुकाबले हुआ करते.

दुकानें लगतीं जिनमें खिलौनों के अलावा चने-परवल, गट्टे-मिश्री, जलेबी-टिकिया और लकड़ी-लोहे के घरेलू सामान बिका करते. ऐसा ही एक दूसरा मैदान थोड़ी दूर पैंठ पड़ाव में था जहाँ बिजली वाले झूले और मौत के कुंएं जैसी आधुनिक सम्मोहक चीजें देखने को मिलती थीं. इन दोनों के बीच पड़ने वाले खेल मैदान पर राष्ट्रीय स्तर की फ़ुटबाल प्रतियोगिता भी होती. संक्षेप में जुलाई-अगस्त के रामनगर की शोभा किसी रियो दे जेनेरियो या लास वेगास से कमतर न होती.

इन सब से ऊपर नौटंकी का नंबर था जो एक लोकप्रिय कला के तौर उन दिनों अपनी अंतिम सांसें गिन रही थी अलबत्ता यह बात मुझे उस वक्त मालूम नहीं थी. बात सन 1977-78 की होगी. 10-11 साल की उम्र थी. लाउडस्पीकर से सुसज्जित, नौटंकी का विज्ञापन करता हाथ-ठेला घर के आगे से गुजरता तो घर के बड़ों की निगाहें हमें बता दिया करतीं कि यह कोई ऐसी चीज है जो गंदी है और हम बच्चों के मतलब की नहीं है. अमूमन अपने को बहुत सयाना समझने वाले घर के बड़े नहीं जानते कि बच्चे उससे कहीं ज्यादा सयाने होते हैं जितना उन्हें समझा जाता है. वैसा ही मेरे घर का भी हाल था.

अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज चौहान और सुल्ताना डाकू जैसी क्लासिक नौटंकियों के परे जिस नौटंकी ने पूरे दो बरस मेरे दिल पर राज किया उसका नाम था मोहब्बत की कीमत’. रात के किसी समय नौटंकी शुरू होती. अपने सहज ज्ञान से मुझे मालूम पड़ चुका था कि उसे देखने जाने वाले लोग चरित्रहीन समझे जाते हैं. नगर के जो शरीफ लोग उसे नहीं देख पाते थे उनकी सुविधा के लिए कम्पनी ने यह इंतजाम कर रखा था कि पूरी रात भर लाउडस्पीकर पर नौटंकी बजा करती.

इस रात भर चलने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम से घर पर किसको क्या फर्क पड़ता है मेरी सोच के दायरे से बाहर की चीज थी. घर के ऐन सामने स्थापित नौटंकी के रंगबिरंगे तम्बू से निकलने वाली संवादों और गीतों की आवाजें एक नए कल्पनालोक की रचना करती थीं जिसके भीतर मेरी तमाम फैन्टेसियों ने अपने आशियाने बना लिए थे. तेज रफ़्तार और कैची धुनों पर आधारित इन नौटंकियों के ज्यादातर गाने हम दोस्तों को रट गए थे.मोहब्बत की कीमतका एक ख़ास गाना सब का फेवरेट बना.

एक दिन घर पर मेरी पसंदीदा दाल बनी हुई थी. सब लोग रसोई के सामने बरामदे में पंगत में बैठकर खा रहे थे. अचानक यूं हुआ कि भोजन से मिल रहे आनंदातिरेक ने मेरे भीतर के गायक को जगा दिया. मुंह में खाना धरे-धरे मैंने अपना प्रिय गीत गुनगुनाना शुरू कर दिया. तू है नागिन मैं हूँ संपेरा, संपेरा बजाये बीन” – मुंह से पहली पंक्ति प्रस्फुटित हुई ही थी कि मैंने अपनी आँखों के सामने बेशुमार तारों की झिलमिल देखी. पिताजी ने मेरी मुंडी पर इतनी जोर का झापड़ मारा था कि मेरा पिद्दी चेहरा नीचे धरी थाली में जा लगा.

भयानक तरीके से गुस्साए पिताजी बड़े भाई-बहनों को शरीफ लोगों वाले उपदेश देना शुरू कर चुके थे. झापड़ बहुत शक्तिशाली था. अभी मेरा चेहरा थाली पर ही था. दाल-भात में उसके सन चुकने के बावजूद मेरी आत्मा गाना पूरा कर रही थी – “लौंडा पटवारी का बड़ा नमकीन”.

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"...आपको भी याद है क्या?" - मधु

 

 

मेरे स्कूल के दिनों में टीचर के पेन माँगते ही हम बच्चों के बीच राकेट गति से गिरते पड़ते सबसे पहले उनकी टेबल तक पहुँच कर पेन देने की अघोषित प्रतियोगिता होती थी | जब कभी मैम किसी बच्चे को क्लास में कापी वितरण में अपनी मदद करने पास बुला ले तो मैडम की सहायता करने वाला बच्चा अकड़ के साथ "अजीमो शाह शहंशाह " बना क्लास में घूम घूम कर कापियाँ बाँटता और बाकी के बच्चें मुँह उतारे गरीब प्रजा की तरह अपनी चेयर से न हिलने की बाध्यता लिए बैठे रहते | मैडम की उपस्थिति में क्लास के भीतर चहल कदमी की अनुमति कामयाबी की तरफ पहला कदम माना जाता । उस मासूम सी उम्र में उपलब्धियों के मायने कितने अलग होते थे _ मैम ने क्लास में सभी बच्चो के बीच गर हमें हमारे नाम से पुकार लिया .....या फिर अपना रजिस्टर स्टाफ रूम में रखकर आने बोल दिया तो समझो कैबिनेट मिनिस्टरी में चयन का गर्व होता था | मुझे आज भी याद है जब बहुत छोटे थे तब बाज़ार या किसी समारोह में हमारी टीचर दिख जाए तो भीड़ की आड़ ले छिप जाते थे | किसी भी सार्वजनिक जगह पर टीचर को देख बच्चें जाने क्यों छिप जाते है ? अब कोई भरी भीड़ में वो अपने छात्र को चमाट तो जमाते नही थे |

हम कैसे भूल सकते है अपने उन गणित के टीचर को जिनके खौफ से 17 और 19 का पहाड़ा याद कर पाए थे लेकिन सिर्फ स्कूल के दिनों तक अब तो फिर याद नही | ब्लैक बोर्ड को गणित टीचर कास ,थीटा , अल्फा ,साइन से सफ़ेद कर देते थे जैसे ब्लैक बोर्ड पर अनगिनत कीड़े मकोड़ों की महफ़िल जुट गई | हम सहेलियों को और कुछ पल्ले पड़े न पड़े एक बात जरूर याद रहती थी देख चाक पावडर से सर की मूंछ सफ़ेद हो गयी |” कैसे भूल सकते है उन सौम्य हिंदी शिक्षिका को जिनके आवेदन पत्रों से ये गूढ़ ज्ञान मिला कि बुखार नही ज्वर पीड़ित होने के साथ सनम्र निवेदन कहने के बाद ही तीन दिन का अवकाश मिल सकता है | परीक्षा की उत्तरपुस्तिका में कविता के भावार्थ की व्याख्या से पहले सन्दर्भ , फिर प्रसंग और अंत में व्याख्या लिखते थे | जिन महाज्ञानी बच्चों को मैडम पर अपनी विद्वता का अतिरिक्त प्रभाव जमाना होता था वो एक कदम और आगे बढ़ाते थे | वे पांखडी छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका में भावार्थ में सबसे पहले प्रसंग, फिर सन्दर्भ फिर व्याख्या और अंत में ज्ञानप्रदर्शन के निचोड़ की पूर्णाहुति के रूप मेंविशेषलिखते । विशेष लिख डेश (-) लगाकर कवि द्वारा किन पँक्तियों में समास , सन्धि, उपमा , अलंकार का कहाँ कहाँ प्रयोग हुआ है आदि आदि । 

 

कैसे विस्मृत हो सकते है सामाजिक विज्ञान के वो सर जिनके लिखाए लम्बे नीरस उत्तरों में पानीपत के तीनों युद्ध से लेकर दोनों विश्व युद्ध के कारण और प्रभाव याद करने में सुबह से शाम हो जाती थी | ऊऊफ़्फ़्फ़ कौन समझ सकता है बाल मन में उपजी भूगोल की उस जटिल उलझन को कि इतनी बड़ी पृथ्वी से चिपककर कौन से स्पाइडमैन ने देशांतर ,मध्यांतर और भूमध्य रेखाए खींची थी | साइंस प्रैक्टिकल रूम में पहली बार प्रवेश का रोमांच आज भी याद है |चारों तरफ परखनली और रसायन में डूबे कीड़े मकोड़ों के बीच सफ़ेद एप्रेन पहनकर हमें किसी हॉलीवुड फिल्म में डाइनासोर के अण्डों या शहर में तबाही मचाती मकड़ी को मारने वाले रसायन पर रिसर्च करने वाले स्कॉलर की अनुभूति होती थी | तभी लैब में अचानक साइंस मैम की गरजती आवाज़ "ये परखनली किसने तोड़ी ?" जैसे घातक प्रश्नों के बाद ही डाइनासोर के डी. एन. ए .पर शोध करते हम महान जीव वैज्ञानिक चेतना के वास्तविक धरातल में वापस आते | जिस बच्चे की किस्मत ज्यादा खराब होती थी प्रैक्टिकल रूम में उसके हाथ से बड़े बीकर छूटते थे | आज भी याद आती है वो अंग्रेजी टीचर जिनके सानिध्य में टेन्स सीखते वक़्त पास्ट परफेक्ट और प्रेजेंट परफेक्ट में वर्ब के तीनों फ़ार्म याद करते करते अंग्रेजी साहित्य में हम अपना फ्यूचर डार्क देखते थे |

 

अपनी उस कक्षा शिक्षिका को कैसे भूले जो शोर मचाते बच्चों से भी ज्यादा ऊँची आवाज़ में गरजती ..” मछली बाज़ार है क्या ?”.... मैंने तो मछली बाज़ार में मछलियों के ऊपर कपड़ा हिलाकर मक्खी उड़ाते खामोश दुकानदार ही देखे है| कही कोई हल्ला गुल्ला नही होता | मैम ने किसी और फिश मार्केट की बात की होगी | नही भूल सकते उन स्नेहिल नर्सरी मैम को जिन्होंने हमारे आंसुओ से भीगे चेहरे और मम्मी पास जानाको रुमाल से पोछ मीठी आवाज़ में कहा था .बस बेटा अभीईईईईइ घंटी बजेगी और मम्मा आ जाएगी |” कैसे भूलू उस टीचर को जो महज़ एक गुलाब देकर गुड मार्निंग बोलने से गुलाब सी खिल जाती थी । वो टीचर तो आपको भी बहुत अच्छे से याद होंगे जिन्होंने आपकी क्लास को स्कूल की सबसे शैतान क्लास की उपाधि से नवाज़ा था | उन टीचर को तो कतई नही भुलाया जा सकता जो होमवर्क कापी भूलने पर ये कहकर कि ... “ कभी खाना खाना भूलते हो? ” ...बेइज़्ज़त तकिया कलाम से हमें शर्मिंदा करते थे | टीचर के महज़ इतना कहते ही कि "एक कोरा पेज़ देना" पूरी क्लास में फड़फड़ाते 50 पन्ने फट जाते थे । क्या आप भूल सकते है गिद्ध सी पैनी नज़र वाले अपने उस टीचर को जो बच्चों की टेबल के नीचे छिपाकर कापी के आखरी पन्नों पर चलती दोस्तों के मध्य लिखित गुप्त वार्ता को ताड़ कर अचानक खड़ा कर पूछते "तुम बताओ मैंने अभी अभी क्या पढ़ाया ?" अपराधी बच्चे फक्क जर्द चेहरे के साथ बगले झाँकने लगते । टीचर की ऐसी छापामारी में कभी कभार उदार , सहयोगी पड़ोसी छात्र हौले से फुसफुसा कर मदद कर देते तो बात बन भी जाती थी ।क्लास में राउंड लगाती टीचर यदि सीट के बाजू से गुजरती हुई एक नजर हमारी खुली कापी में डाल दे तो 440 वोल्ट का करंट लगता था । अधूरे होमवर्क को उनके पीरियड आने के पहले पड़ोसियों की उधार ली कापियों से हड़बड़ी में पूरा करते थे । उनके टेबल के पास खड़े रहकर कॉपी चेक कराने के बदले यदि मुझे सौ दफा सूली पर लटकना पड़े तो वो ज्यादा आसान था । क्लास में मैम के प्रश्न पूछने पर उत्तर याद न आने पर कुछ लड़कों के हाव भाव ऐसे होते थे कि उत्तर तो जुबान पर रखा है बस जरा सा छोर हाथ नही आ रहा । ये ड्रामेबाज छात्र उत्तर की तलाश में कभी छत ताकते ,कभी आँखे तरेरते ,कभी हाथ झटकते । देर तक आडम्बर झेलते झेलते आखिर मैम के सब्र का बांध टूट जाता --you , yes you get out from my class .... वह ढोंगी सर झुकाकर बाहर निकलता तब जाकर क्लास के कई बच्चों के कलेजे में ठंडक पड़ती । 

 

वो टीचर तो पक्का याद होंगी जिनका जन्मदिन पता चलने पर क्लास का ब्लैक बोर्ड रंग बिरंगी चाक से हैप्पी बर्थडेलिख सजा दिया गया था | परीक्षाओं के नज़दीक आने पर हमारी फ़िक्र में रविवार को भी एक्स्ट्रा क्लासेस लेते टीचर्स | सुबह की प्रार्थना में जब हम दौड़ते भागते देर से पहुँच कर भी "लेट कमर" की लाइन से बचने चोरी चोरी मुख्य पंक्ति में जाकर सबसे पीछे खड़े होते तभी सी .आई. डी. निरीक्षण वाली वो कड़ी नज़र जो सिर्फ आँख के इशारे से हमें लाइन से बाहर करती थी | हमारे शिक्षकों को रत्तीभर भी अंदाजा न होता था कि हम शातिर छात्रों का ध्यान प्रार्थना में कम और आज के सौभाग्य से कौन कौन सी टीचर अनुपस्थित है के मुआयने में ज्यादा रहता था । आपको भी वो टीचर याद है न जिन्होंने ज्यादा बात करने वाले दोस्तों की सीट्स बदल उनकी यारी कमजोर करने की साजिश की थी | मैं आज भी दावा कर सकती हूँ कि एक या दो टीचर्स शर्तिया ऐसे होते है जिनके सर के पीछे की तरफ़ अदृश्य नेत्र का वरदान मिलता है | ये टीचर ब्लैक बोर्ड में लिखने में व्यस्त रहकर भी चीते की फुर्ती से पलटकर कौन बात कर रहा है का सटीक अंदाज़ लगाते थे | रब्बा ! हम बच्चे हिरण के छौनो से सहम जाते थे | वो टीचर याद आये या नही जो चाक का उपयोग लिखने में कम और बात करते बच्चों पर भाला फेक शैली में ज्यादा लाते थे ? उन खिलंदड़े टीचर को भला कौन भूल सकता है जो खेल के मैदान में अचानक दौड़ते हुए छात्रों की टीम में सम्मिलित हो जाते थे और फिर बच्चों के लिए हार जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण उनके साथ खेलने का जश्न हो जाता था | जब टीचर एग्जाम हाल में प्रश्न पत्र पकड़कर घूमते और पूछते " एनी डाउट " तब मुझे तो मैथ्स पेपर में हमेशा एक ही डाउट रहता है कि हमें ये ग्राफ पेपर क्यो मिला है जबकि प्रश्रपत्र में ग्राफ किसमें बनाना है मुझे तो यही नही समझ आ रहा । सभी लोग राउंडर का इस्तेमाल किस कोश्च्यन में कर रहे है ? मैं अपनी मूर्खता जग जाहिर ना करके चारों ओर सर घुमाकर देखते चुप बैठी रहती । हर क्लास में एक ना एक बच्चा होता ही है जिसे अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करने में विशेष महारत होती है और ये प्रश्नपत्र थामे एक अदा से खड़े होते है... मैम आई हैव आ डाउट इन कोश्च्यन नम्बर 11 ....हमें डेफिनेशन के साथ एग्जाम्पल भी देना है क्या? उस इंटेलिजेंट गणितज्ञ की शक्ल देख खून खौलता - अरे ससुर के नाती तू डेफिनेशन में एग्जाम्पल भी लिखना चाह रहा है वो शब्द हमने पहली दफा एक सेकेंड पहले तेरे मुँह से ही सुना है । एग्जाम हाल में मैडम प्रश्नपत्र में करेक्शन के लिए कहती कि.. सवाल नम्बर फला फला गलत छप गया है , इस सवाल के बदले आप लोग नया सवाल लिखिए । "कौन बनेगा करोड़पति" के स्वीच द कोश्च्यन वाली लाभ की स्थिति में भी मैं हमेशा ही नो प्रॉफिट नो लॉस में रही । बाद में बदला गया प्रश्न भी मुझे हमेशा पहले गलत छपे प्रश्र जितना ही अबूझा गुप्त कोडिंग लैंग्वेज का लगता परीक्षा के बाद जाँची हुई कापियों का बंडल थामे कॉपी बाँटने क्लास की तरफ आते शिक्षक साक्षात सुनामी लगते थे। ये वो दिन थे जब कागज़ के एक पन्ने को छूकर खाई 'विद्या कसम' के साथ बोली गयी बात संसार का अकाट्य सत्य हुआ करता थी।

मेरे लिए आज तक एक रहस्य अनसुलझा ही है | खेल के पीरियड का 40 मिनिट छोटा और गणित पीरियड का वही 40 मिनिट लम्बा कैसे हो जाता था ?? जब कभी स्कूल में अलग अलग सदन (हाउस) की प्रतियोगिता होती थी तब हमारे शिक्षक भी शोर मचाते हुए अपने सदन का उत्साहवर्धन करते थे | कभी हमारी टिफ़िन से एक निवाला खा हमें उपकृत करते थे तो कभी हमारे टिफिन भूल जाने पर दोस्तों को साथ खिलाने कह जीवन में साझेदारी का सुख समझाते | जब कभी कोई खूंखार टीचर मुस्कुरा कर चमत्कृत करते तो उनकी मारक मुस्कान बच्चों के बीच एक सुखद चर्चा का विषय होती | स्कूल के गलियारे में कभी हम दोस्तों के साथ उछलते कूदते , सांमने चल रहे बच्चे के जूते पीछे की तरफ से अपने पैर में दबाकर निकालते हुए ,धौलधप्पा और खी खी कर जा रहे हो तभी एकाएक सामने से आते शिक्षक की उपस्थिति मात्र से पैरों में सेना के नियंत्रित कदमताल का हुनर आ जाता | अनुशासित सर झुकाकरगुड मार्निंग सरकह पतली गली पकड़ भाग निकलते

 

सामने की सीट पर बैठने के नुकसान थे तो कुछ फायदे भी थे ।मसलन चाक खत्म हुई तो मैम के इतना कहते ही कि " कोई भी जाओ बाजू वाली क्लास से चाक ले आना। " सामने की सीट में बैठा बच्चा लपक कर क्लास के बाहर । दूसरी क्लास में "मे आई कम इन" कह सिंघम एंट्री करते । कई बार "सरप्राइज़ चेकिंग" के नाम पर हम पर कापियाँ जमा करने की बिजली भी गिरती थी | सभी बच्चों को चेकिंग के लिए कापी टेबल पर ले जाकर रखना अनिवार्य होता था | टेबल पर रखे जा रहे कापियों के ऊँचे ढेर में अपनी कापी सबसे नीचे दबा आने पर तूफ़ान को जरा देर के लिए टाल आने की तसल्ली मिलती थी | कौन भूल सकता है साइंस वायवा टेस्टजिसमें बाहर से आये "एक्सटर्नल" के सामने हमारे टीचर बारात की तीमारदारी करते नज़र आते थे । ये आव भगत हमें अच्छे अंक दिलाने की ही एक सोची समझी रणनीति होती थी | 15 अगस्त की परेड के मार्चपास्ट में चयनित होने की उम्मीद लिए खेल के मैदान में कड़ी धूप में खड़े घण्टों लेफ्ट राईट करते स्पोर्ट्स टीचर के साथ कदमताल मिलाते | क्या आप भी परीक्षा कक्ष में घुसने से पहले बाजू वाली कक्षा में झांकते चलते थे कि वहाँ किस शिक्षक की ड्यूटी है ? अगर सीधे ,सज्जन और थोड़े से सुस्त शिक्षक परीक्षा कक्ष में आ जाते तो बच्चों के भाग्य से झीका टूटता | ऐसा भी होता था कि जब हम नयी कक्षा में जाने वाले होते थे तो मार्च माह से ही तनाव भरा माहौल शुरू हो जाता क्योंकि "नयी वाली क्लास प्रिंसिपल रूम के ठीक बाजू में है ।" उस कक्षा में पहुँचने के बाद तो हर समय एक ही डायलाग सुनतेतुम लोगो का शोर प्रिंसिपल रूम तक सुनाई दे रहा है ।अमा हद है यार ! अब प्रिंसिपल रूम बाज़ू में है इस बात पे हम बच्चों की लिप्स सर्जरी कर सिलवा दोगे या जीभ कटवा दोगे क्या ? हमें भी तो प्रिंसिपल रूम की सारी बातें सुनाई देती है | हमने तो कभी शिकायत नही की | बहुत नाइंसाफी थी जी । किस किस की याद करे , कहाँ कहाँ तक दुखड़ा रोवे ।

 

वो निर्दयी टीचर जो पीरियड खत्म होने के बाद का भी पाँच मिनिट पढ़ाकर हमारे लंच ब्रेक को छोटा कर देते थे ।हम पढ़ रहे होते थे और दूसरे बच्चें हमारी कक्षा के सामने से झाँकते हुए मुस्कुराते , घूमते ,बतियाते नसीबों वाले लगते थे ।कई बार कुछ शातिर बच्चे शेर आया, शेर आयाकी तर्ज़ पर भयभीत करने हमारी शोर मचाती कक्षा को पल भर में शांत करने के मज़े लेते थे | क्लास के ये नौटंकीबाज छात्रमैम इज़ कमिंगका गगनभेदी झूठा एलान कर स्वयं भी गिरते पड़ते अपनी सीट की तरफ लपक शांत बैठ जाते | सभी बच्चे मैडम की एंट्री से पहले अपनी अपनी सीट पर पहुँचने के लिए अफरा तफरी दौड़ते । पल भर का विध्वंशकारी भूचाल और दूसरे ही क्षण सारे आज्ञाकारी ,मासूम बच्चे व्यवस्थित अपनी सीट पर साँस थामे मैम के आने की प्रतीक्षा करते | सभी लोगों पर अपने फरेब का शानदार असर देख जब वो मक्कार बच्चा छिछोरी हंसी हंसता तब सत्य का उदघाटन होता _ मुआ सबको उल्लू बनाकर खीसे निपोरते लोट पोट हो रहा है । चंद होशियार बच्चे हर क्लास में होते है जो मैम के क्लास में घुसते ही याद दिलाने का सेक्रेटरी वाला काम करते है " मैम कल आपने होमवर्क दिया था ।" जी में आता था इस आइंस्टीन की औलाद को डंडों से धुन के धर दो । आपको याद है न जब टीचर आपके टिफिन से एक टुकड़ा रोटी तोड़ खाने से मिली आनंदअनुभूति अगले हप्ते भर उनके पीरियड में बनी रहती ❣️कभी कभी ऐसा भी होता था कि मैम की नजर बचा जरा सा दाँत निपोरा नही कि...."स्टैंड अप..यस यू ....खड़े हो जाओ अपनी सीट पर ।आपको किस बात पर इतनी हँसी आ रही थी। हमें भी बताओ सब मिलकर हँसेंगे । " कसम से नानी याद आ जाती थी ।

कई बार ऐसा भी हादसा हुआ कि टीचर की अनुपस्थिति में किसी फ्री पीरियड में हम में से कुछ बच्चे आनंद मनाते कुर्सियों नही बल्कि टेबल पर बैठे हँसी ठिठोली में मशगूल होते थे , कुछ लोग ब्लैक बोर्ड को अपनी कलात्मक चित्रकारी से सजाने में व्यस्त होते ,कुछ फर्श पर पड़े चाक के टुकड़ो को एक दूसरे पर फेकने में मस्त , कुछ लोग आज टिफिन में क्या लाए है खोल कर दिखाते हुए , कुछ बच्चें ऊँचाई पर टेबल में खड़े हो उस दिन उपस्थित छात्रों को गिनने , कुछ छात्र अपनी पेंसिल को इस तरह छिल रहे होते कि उसका छिलका बिना टूटे एक फूल की तरह गोल बनकर बाहर आये कहने का अर्थ है कि सभी लोग बेमतलब के अति महत्वपूर्ण कार्यों में लगे रहते थे | तात्पर्य है कि क्लास का माहौल स्वर्ग सा उत्सवी होता था | तभी क्लास की ऐसी रंगीन फिजा में अचानक ही अबूझा तनाव महसूस होता | आनन्द में डूबे लोग एकाएक गज़ब की फुर्ती से बेआवाज़ ,आतंकित , तीतर बितर अपनी अपनी सीट की तरफ क्यों भाग रहे हैं ??? मामला संदेहास्पद जान दरवाज़े की तरफ पलटकर देखो तो पता चले हाय रब्बा ! खूंखार मुद्रा में सर जी जाने कब से अपनी खूनी आँखों से ये मस्त मंजर खामोश देख रहे थे | "बचा लियो भगवान" की प्रार्थना करते चुप उसी टेबल से फिसलते कुर्सी पर आ जाते ।कई बार क्लास में मची ऐसी ही अफरा तफरी, धक्का मुक्की , भागदौड ,जान बचाने की रेलमपेल और त्राहिमाम में जहाँ हमारी निर्धारित सीट होती वहाँ तक पहुँचने के रास्ते में ही क्रोध से काँपते टीचर तनकर खड़े होते थे । अपनी सीट तक पहुँचने के लिए भूखे शेर के बाजू से निकलने का रिस्क लेना मुनासिब ना जान पड़ता । चुपचाप दोस्तों की सीट पर भी बैठना पड़ा |वहाँ न हमारा बैग , न हमारी कापी । दूसरे के बैग से कापी निकाल ढक्कन लगी पेन को कागज के ऊपर घुमाते हुए सर झुकाये लिखने का झूठा उपक्रम भी करना पड़ा ।

तमाम शरारतों के बावजूद ये बात सौ आने सही हैं कि बरसों बाद उन टीचर्स के प्रति स्नेह और सम्मान और बढ़ गया है | काश किसी मोड़ पर अचानक वो मिल जाए तो बचपन की तरह अब हम छिपेंगे नही बल्कि पूरी श्रद्धा से एक बार चरणस्पर्श कर लेंगे | माता, पिता और गुरु ये तीन प्राणी है जो निर्विवाद , निःस्वार्थ हमको अपने से आगे देख प्रसन्न होते है | वास्तव में हम प्रति दिन 8 घण्टे के हिसाब से पूरा बचपन और तरुणाई टीचर्स के साथ ही बिता देते है | जीवन के सबसे खुबसूरत , बेफिक्र ,अबोध ,सपनीले , सम्भावनाओं से लबरेज़ , ऊर्जा से भरपूर , ख़्वाबों से भीगे और भावी योजनाओं के भरे स्कूल बैग के साथ की सारी यादे हमारे शिक्षको के आस पास ही मंडराती है | आज हम जो कुछ भी हैं इस बेहतरी की नीव का पत्थर उन शिक्षकों की मेहनत का ही परिणाम हैं | आज भी जब मैं स्कूल या कालेज की बिल्डिंग के सामने से गुजरती हूँ तो लगता है कि एक दिन था जब ये बिल्डिंग मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा थी | अब उस बिल्डिंग में न मेरे दोस्त है , न हमकों पढ़ाने वाले वो टीचर्स । बच्चो को लेट एंट्री से रोकने गेट बंद करते मोहन भइय्या भी नही जिन्हें देखते ही हम दूर से चिल्लाते थे गेट बंद मत करो भैय्या प्लीज़ |” वो बूढी सरस्वती अम्मा भी नही है जो मैम से सिग्नेचर लेने जब जब लाल रजिस्टर के साथ हमारी क्लास में घुसती तो बच्चों में ख़ुशी की लहर छा जाती कल छुट्टी है |” अब स्कूल के सामने से निकलने से एक टिस सी उठती है जैसे मेरी कोई बहुत अजीज चीज़ छीन गयी हो । आज भी जब उस ईमारत के सामने से निकलती हूँ तो छुट्टी के बाद निकलते बच्चों के चेहरे वैसे ही खिले खिले है ,वही मेरा जाना पहचाना यूनिफार्म और टाई लेकिन अजनबी चेहरों का परायापन है | स्कूल_कालेज की शिक्षा पूरी होते ही व्यवहारिकता के कठोर धरातल में, अपने उत्तरदाईत्वो को निभाते , दूसरे शहरो में रोजगार का पीछा करते , दुनियादारी से दो चार होते , जिम्मेदारियों को ढोते हमारा संपर्क उन सम्मानित शिक्षको से टूट जाता है | उनसे मिले मार्गदर्शन , स्नेह , अनुशासन , ज्ञान ,ईमानदारी , परिश्रम की सीख और लगाव की असंख्य कोहिनूरी यादें किताब में दबे मोरपंख सी साथ होती है जब चाहा खोल कर उस मखमली अहसास को छू लिया स्कूल, कालेज,कोचिंग, ट्यूसन , हॉबी क्लास , स्पोर्ट्स कोचिंग , यूनिवर्सिटी से लेकर उन समस्त व्यक्तियों को जिनसे जीवन में कुछ सीखने मिला धन्यवाद कहने साल में एक बार शिक्षक दिवस का दिन ही जरूरी नही है । हर दिन उन्हें सादर चरणस्पर्श और समंदर भर आभार | ......Madhu

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MADHU - writer at film association MUMBAI

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"दास्तान ए शौक - पढ़ना"- सिंह उत्तम

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